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Friday, April 27, 2012

मत जाओ

मत जाओ मेरे पास ही बैठी रहो
की तुम बिन सब कुछ सूना सूना सा लगता है

चुप रहना है तो चुप ही रहो
तुम्हारी मर्ज़ी है अगर तो कुछ ना कहो
खो जाने दो कुछ देर के लिये इन आँखों में
कितना भी देखूं इस हसीं चेहरे को
जी भरता ही नहीं

एक अजीब सी कशिश है जो खिंचती है मुझे
तुम्हारी ओर
तुम्हे देखकर ये धड़कनें
जाने क्यूँ तेज़ हो जाती हैं
तुम चली जाती हो तो कुछ भी अच्छा नहीं लगता

मत जाओ मेरे पास ही बैठी रहो
की तुम बिन सब कुछ सूना सूना सा लगता है

Friday, December 23, 2011

बरसों पहले

अश्कों ने परदा सा कर दिया है आँखों पे
कुछ धुंधली यादों ने आज फिर
आ घेरा है मन को
शायद जिंदा हु इन्ही 
प्यारी कड़वी मीठी यादों के सहारे
दिल आज फिर वहीँ जा पंहुचा है
जहाँ तू छोड़ गया था
मुझे...


शायद तु कभी आये लौट कर 
मुझे ढूंढता हुआ
तुझे तकलीफ न हो मुझे खोजने में
मैं वहीँ हूँ
हाँ मैं उसी जगह मिलूँगा तुझे
जहाँ तु छोड़ गया था
मुझे...बरसों पहले...
-शैल

Friday, November 4, 2011

ग़ज़ल 14

प्यार, मोहब्बत, वफ़ा सब फ़साना सा लगता है
शहर में कोई नहीं जाना पहचाना सा लगता है

किसी की याद, ग़म-ए-तन्हाई और जाम है साथ
मयकदे में हर शक्स दीवाना सा लगता है

उसकी जुल्फें, उसकी आँखें, उसके चेहरे की रौनक 
दीदार-ए-आरजू लिए एक पल भी ज़माना सा लगता है

क्या कहें की दिल टूटा है कैसे और कितनी बार
किसी का प्यार से देखना भी अब सताना सा लगता है

इस दिल में अब तो वही है बस वही रहेगा "शैल"
किसी और को कितना भी सोंचू अनजाना सा लगता है

Monday, September 5, 2011

ग़ज़ल 13

खुशियों को तो एक पल में भुलाते हैं
दर्द का जाने क्यूँ लोग आइना दिखाते हैं

गुज़रते न थे जो मयकदों की गलियों से भी
आज देखा तो पैमानों पे पैमाने पिलाते हैं

कभी तो आओगे लौटकर तुम इस तरफ भी
इसी उम्मीद में घर अपना रोज़ सजाते हैं

उसकी चाहत में कभी मैं न था शामिल
फिर भी उसके प्यार की झूठी आस लगाते हैं

क्यूँ याद करता है तू उन लोगों को शैल
तुझे भुलाकर जो हर रोज़ जशन मनाते हैं

Tuesday, August 9, 2011

ग़ज़ल 12

अभी तो तेरे गुनाहों का हिसाब होगा
कुछ अनकहे सवालों का जवाब होगा

पहचानना गौर से अपने दुश्मनों को
मिलेंगे वो तो चेहरों पे नकाब होगा

मिल जायेगा हमदर्द किसी को जहां में
ये तेरे मन का भ्रम या कोई ख्वाब होगा

रुकना नहीं मुश्किलों से डरकर कभी
बढ़ता रहा जो वही कामयाब होगा

खुश तो होते हैं कुछ पाने पे सभी
खोने पे जो मुस्कुराया वो नवाब होगा

कभी मत देना किसी को मशवरा शैल
वक़्त के साथ अपना ही दामन खराब होगा

Wednesday, July 27, 2011

ग़ज़ल 11

तेरे लिए न जाने कितनो से दूर हुआ
वक़्त के साथ ये दिल भी मजबूर हुआ 

इश्क को कब सराहा है  जग वालों ने
मरने के बाद ही ये मशहूर हुआ

किसकी तमन्ना किये बैठा है ऐ दिल
दिल तोड़ना तो ज़माने का दस्तूर हुआ

तू जो साथ है तो कर जायेंगे कुछ भी
तेरे लिए हर सितम भी मंजूर हुआ

क्यूँ नहीं मिलती हैं तकदीरें अपनी शैल
दीवानों से ऐसा भी क्या कसूर हुआ

Thursday, July 7, 2011

ग़ज़ल 10

तुम्ही बता दो कि ये जिंदगानी क्या है
तेरी ख़ामोशी मेरा इंतज़ार ये कहानी क्या है

लिख ना पाता था जो एक लफ्ज़ चाहकर कभी
आज उसकी कलम में ये रवानी क्या है

रोज़ वादा करके मुकर जाने वाले बता
आज ना आने के लिए बात बनानी क्या है

कभी लड़ते हो तो कभी खामोश रहते हो
यूँ ही गुज़र जाए तो फिर जवानी क्या है

जाने क्यूँ याद आते हो हर पल मुझे शैल
आखिर मुझसे तुम्हे ये परेशानी क्या है

Saturday, July 2, 2011

ग़ज़ल 9

तू जो मुस्कुराया तो इक फ़साना बना
ग़म छुपाने का इक बहाना
बना

तुझे देखकर संभल न पाया
कभी
तेरा हुस्न इस क़दर कातिलाना बना

आये गए हज़ार इस ज़िन्दगी में
पर दिल का कहीं और न ठिकाना
बना

तेरी हर एक अदा पे प्यार आता है
क्या कहूँ क्यूँ मैं दीवाना बना

मिट न सका है किस्सा-ए-मुहब्बत शैल
चाहे दुश्मन इश्क का ज़माना बना

Thursday, June 30, 2011

ग़ज़ल 8

उसकी यादों से ये शाम रंगीन है
मेरे ख़्वाबों की दुनिया अब भी हसीन है

सज़ा कुछ भी हो मुक़र्रर कर चाहत की
किया इस दिल ने जो खता वो संगीन है

गिरने दे आँखों से तो कुछ सुकून मिले
ये कहकर मेरे अश्क भी ग़मगीन हैं

चाहे उड़ ले जितना ऊंचा पर ये सोच ले
तेरे पांव के नीचे आसमान नहीं ये ज़मीन है

मत कर दुनिया से ख़ुशी की उम्मीद शैल
मसर्रत नहीं ये तो ग़म की शौक़ीन है

Sunday, May 15, 2011

ग़ज़ल 7

हर तरफ घनघोर अँधेरा ही अँधेरा है
इन काली रातों से बहुत दूर सवेरा है

जिन पेड़ों पे कभी घोसले थे पंछियों के
उनकी डालियों पे वीरानियों का बसेरा है

बरसते थे बादल उनके आने की ख़ुशी में
अब तो दिन रात इस आसमान पे उनका डेरा है

बिखर गए हैं सब हवा के एक झोंके से
रिश्ते थे या भ्रम बस समझ का फेरा है

इन घटाओं से आँधियों  का गुमां होता है
बचाकर के रखना तिनको का घर तेरा है

काश उसकी यादों को मिटा पाना मुमकिन होता शैल
वो शक्स जो मेरे ख़्वाबों का होकर भी न मेरा है

Thursday, April 14, 2011

ग़ज़ल 6

शाम को सुबह का इंतज़ार कब तक होगा
इंसान से इंसान परेशान कब तक होगा

नफरतों से घिरा है प्यार से बेज़ार आदमी
हमारे दिलों में ये रेगिस्तान कब तक होगा

वो मुझसे दूर जाकर लौट आयेगा एक दिन
उसके जाने से ये दिल हैरान कब तक होगा

ना मिलेगा वो मंदिर में ना ही मस्जिद में
हर शक्स अपने वजूद से अनजान कब तक होगा

वक़्त आने पे उग जायेगी फसल-ए-मुहब्बत शैल
यहाँ हिंदुस्तान वहाँ पाकिस्तान कब तक होगा

Sunday, April 10, 2011

ग़ज़ल 5

अब तो निकल आओ परदे से आफताब बनकर
कब तक छुपे रहोगे यूँ ईद का चाँद बनकर

कोई नफ़रत कोई शिकायत न रहेगी किसी से
जब मिला करोगे सबसे इंसान बनकर

बहुत तकलीफ होती है तेरे जाने के बाद
आया न करो दिल में यूँ मेहमान बनकर

हज़ारों बरबाद हुए तुम्हारी चाहत में
कब तक चुप रहोगे यूँ नादान बनकर

दोस्ती में अब उस मुकाम से गुज़रना है शैल
जब मिलोगे तुम लोगों से मेरी पहचान बनकर

Wednesday, March 2, 2011

ग़ज़ल 4

मजबूर हालात और दिल-इ-नादान से लड़ना सीखा था
ग़म-ए-सागर में उसने मेरे साथ तैरना सीखा था

बड़े शौक से मुझे अपना शगिर्द बोलता है वो
जिसने कभी पढ़कर मेरी किताबें बोलना सीखा था

गिर पड़ता था कभी तो कभी थाम लेता था मेरा हाथ
राह-ए-ज़िन्दगी में उसने मेरी उंगली पकड़कर चलना सीखा था

यूँ तो खिलते थे गुल और पतझड़ भी आते थे मौसम में
सुनकर मेरे अल्फाज़ उसने ज़िन्दगी से मुहब्बत करना सीखा था

उसकी याद अब दिल-ए-गुस्ताख से जाती नहीं शैल
मेरे साथ मिलकर जिसने ख्वाब देखना सीखा था

Tuesday, February 15, 2011

ग़ज़ल 3

इश्क में चुप रहकर भी नज़रों से बात होती है
अब तो ख़्वाबों में तुमसे रोज़ मुलाक़ात होती है

किसी दिन तुम भी देखोगे ये नज़ारा हसीन
मुहब्बत भरे दिलों की बात कुछ ख़ास होती है

फिर न याद आयेंगे ये गिले शिकवे कभी तुमको
जब जान जाओगे की प्यार में क्या बात होती है

कभी तो होगा अहसास तुम्हे मेरी चाहतों का
ग़म-ए-मुहब्बत में बिन सावन बरसात होती है

एक दिन हर तरफ बिखर जाएगा खुशियों का सवेरा शैल
प्यार भरे संसार में भला कब रात होती है

Monday, January 24, 2011

ग़ज़ल 2

उसकी एक झलक के लिए दुनिया से बेगाने हो गए हैं हम
ऐसा लगता है कि इश्क में दीवाने हो गए हैं हम

तेरा जिक्र आने पे जाने क्यूँ लोग मेरा नाम लेते हैं
हर शक्स के चर्चों के फ़साने हो गए हैं हम

भरी महफ़िल में मुझे पहचानने से इनकार करता है
जिसकी तन्हाइयों में गुनगुनाने के तराने हो गए हैं हम

मुझे पता है की मिलती नही अपनी राह-ए-ज़िन्दगी कहीं
पर वो न मिलेगा इस बात से अनजाने हो गए हम

अब तो आजा कि ये दम निकलने को है शैल
तेरे इंतज़ार में दिन महीने ज़माने हो गए हैं हम

ग़ज़ल 1

कुछ पाने की ख्वाहिश को मन में लाया ना गया
उसके जाने के बाद किसी और से दिल लगाया ना गया

कुछ तो बात थी उसकी मुस्कुराहट में
लाख चाहकर भी मुझसे भुलाया ना गया 

यूँ तो खफा मुझसे वो हर रोज़ होता था
लेकिन इस बार वो रूठा ऐसे की मनाया ना गया

किससे कहता मैं हाल-ए-दिल वो जो ना था मेरे पास
उसकी यादों के सिवा अपना कोई बनाया ना गया

कोई नहीं चलता साथ सफ़र-ए-ज़िन्दगी में शैल
अंधेरों में तो साए से भी साथ निभाया ना गया

Sunday, January 10, 2010

एक मुस्की मारने में तेरा क्या जाता है

ये मैंने अपने कॉलेज में लिखी थी। ये कविता नहीं ये बहुत लोगों की फीलिंग्स हैं।
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ये कविता लिखी है मैंने बदलते हालात को देखकर
कभी मिला करते थे जो मुस्कुराकर
Hi बोलना तो दूर
आज चले जाते हैं नजरें फेरकर

ये करिश्मा है गर्लफ्रेंड पाने का
library में हो तो बुक्स बुक्स नहीं दिखती
कैंटीन में साथ हो तो
कोई दोस्त दोस्त नहीं दिखता

शैलेश इस जालिम दुनिया की यही रीत है
जिंदगी में कोई अपना नहीं होता
जब भी जोड़ना चाहा रिश्ता तुमने
तोहफे ही पाए है धोखे के तुमने

एक मुस्की मारने में तेरा क्या जाता है
लोग ये तो समझेंगे की भुला नहीं
यु ही मुस्कुराता रह कि भूलनेवाला भी सोचे
कि क्यूँ वो तुझे भुला नहीं